Tuesday, 25 December 2018

स्वामी विवेकानन्द

हिन्दू धर्म के प्रतिष्ठित धार्मिक अगुवे स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा #प्रभु_यीशु_मसीह के बारे में कहे गये चन्द कथन.....।

धन्य है वे जातियाँ जिनके पास #मसीहा जैसे भगवान है। इसलिए #प्रभु_यीशु_मसीह के करीब जाइये।
कभी मसीहा को मत छोड़ देना। मनुष्य में भगवान देखने का यह प्राकृतिक तरीका है। भगवान के प्रति हमारे सभी विचार वहाँ केंद्रित हैं।
स्वामी विवेकानंद जी!
स्वामी जी को आज उनके देहावसान दिवस पर याद करता हूँ।

संसार की काल्पनिक सोच

बहुत सारे लोगों का काल्पनिक मानना है कि #प्रभु_यीशु_मसीह को 2000 हजार साल हुये।
नही! यहाँ आपकी समझ ही गलत है। साथ ही साथ ये ही आपकी सबसे बड़ी महा गलतफैमी है जो आपको #ईश्वरीय_सच्चाई से कोसों दूर धकेलती है।
प्रभु यीशु मसीह को दो हजार साल नही हुये।
जगत की उतप्ति होने से पहले प्रभु यीशु मसीह ही थे। #पहला और #आखिरी वो ही हैं।
और यीशु को हमने प्रभु नही बनाया वो ऑलरेडी प्रभु हैं।
मामला ये है कि Prabhu Yishu Masih pre existent, co existent and self existent hai.
मामला ये है कि प्रभु यीशु मसीह पहले से मौजूद है, सह अस्तित्व और आत्म अस्तित्व है।
सब कुछ से पहले वो हैं। अपने आप ही हैं

आदि से प्रभु यीशु मसीह ही है। यीशु मसीह परमेश्वर के साथ है। यीशु मसीह ही परमेश्वर है।
यीशु के द्वारा ही हर चीज उत्पन हुई है और आप भी यीशु के द्वारा उत्पन हुए हो। आप उसकी सृष्टि हो। यीशु आपका सृष्टिकर्ता, पालनहारा, तारणहारा, मुक्तिदाता पिता है। यीशु ने आपको और हमको अपने स्वरूप और समानता में बनाया है। मानो या नही मानो प्रभु यीशु मसीह ही आपका सृष्टिकर्ता, पालनहारा, मुक्तिदाता पिता है।

बाइबिल में उतप्ति की जो पहली किताब है उसमें पुरी सृष्टि का वर्णन है उससे पहले प्रभु मसीहा का अस्तित्व, उसके बाद मानव, सूर्य, चंद्रमा, तारे इत्यादि।

प्रभु यीशु मसीह #आदि और #अंत है। पहला और आखिरी हैं।
इसलिए हम आपकी मनगढ़त फिलोसोफी को निरादर के साथ नकारते है। क्योंकि आप लोग सिर्फ डाली डाली चिल्लाते हो जड़ नही पकड़ते हो। जड़ से आपको मोहब्बत है ही नही। दो हजार साल, दो हजार साल, चिल्ला चिल्ला के आप भटकती आत्मा बन चुके हो।
हमारे प्रभु मसीहा शरीर समेत अनंतकाल तक जीवित है, अजर, अमर, अविनाशी है। सारा आदर, गौरव महिमा पराक्रम उनका हैं।

आपको सद्बुद्धि मिले ताकि आप   A को B और B को C कहना बन्द करें।

Every Blessing

धर्मांतरण के झूठे आरोप

घर वापसी और धर्मांतरण के झूठे आरोप लगा कर मसीहियों को सताने वाले लोग विशेष ध्यान दें...!

अजीजों !
आज मैं एक सवाल के साथ आपके सामने उपस्थित हूँ, उपयोगी एवं लाभकारी होना ज्यादा आवश्यक है या पुराना होना??
निसंदेह आपका उत्तर होगा उपयोगी एवं लाभकारी।
अब मसीहियत यानी Chritianity को इस सन्दर्भ (भारत)में समझने की कोशिश करते हैं।
आज समाज में एक ऐसा वर्ग उठ खड़ा हुआ है जो विद्वेषपूर्ण ये भ्रांति फेलाने पर आमादा है कि मसीहियत भारत के लिए ख़तरा है वगैरह वगैरह और इसी उन्माद के चलते सीधे साधे लोग इन धर्म के ठेकेदारों की बातों में आकर चर्चों पर, ईसाईयों की धार्मिक सभाओं में विध्न डालते हैं या औचक हमला कर देते है। घर वापसी जैसे कार्यक्रम भी इसी सोच की देंन है।
भारत में कुछ सर्वविदित आँकड़े, मैंआपके सामने रख रहा हूँ :-
1.मसीही लोगों को भिखारी के रूप में ढूंदना अति दुर्लभ है।
2.जुर्म की दुनिया में ईसाइयों की संख्या नगण्या है।
3.वो राज्य जहाँ ईसाई आबादी अधिक है वो अधिक साक्षर हैं जैसे केरला और नागालैंड।
4.भारत की कुल आबादी का 2.3% होने के बावजूद उच्च गुणवत्ता मेडिकल और शिक्षा में लगभग 50% योगदान।
5.कभी भी किसी भी प्रकार की संप्रदायिक हिंसा में शामिल ना होना।
6.ईसाई संस्थानो, अनाथ आश्रमों, चिकित्सल्यों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नही किया जाता।
7.धार्मिक अल्पसंख्यक होने के बाद भी कभी आरक्षण की माँग नही की।
8.इनके विरोध प्रदर्शन भी शांति के एक मिसाल होते है।
9.कभी भी कोई भी अधिकारी या जज जो मसीही है भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी में लिप्त नही पाया गया।
10.प्रेम, क्षमा की आज भारत में कोई संप्रदाय मिसाल है तो वो सिर्फ और सिर्फ मसीहियत है।
अर्थात अत्यंत उपयोगी और लाभकारी समाज।

फिर क्यों होते है चर्चों पर हमले, नॅन्स के साथ बलात्कार, धार्मिक सभाओं में हिंसा, जीप में ज़िंदा जला देना, घर वापसी जैसे आयोजन...!!!

सोचिए और विचार कीजिए।

इतिहास गवाह है कि परमेश्वर के लोगों को कभी भी सीधे लड़ाई नही करनी पढ़ी क्योंकि उनकी लडा़ई खुद परमेश्वर ने लडी़ फिर चाहे वो मिस्र में राजा फिरोंन का समय हो, रोम में राजा कोन्स्टंताइन का समय हो या हिटलर द्वारा यहूदियों पर अत्याचार हो।
इतिहास गवाह है कि जब जब इन लोगों पर अत्याचार हुए ये लोग आश्चर्यजनक रूप से संख्या, बुद्धि, दिल, दिमाग, आत्मा और बल में बढ़ते गये।

प्रेम, शांति और क्षमा मसीहियत के प्रमुख स्तंभ है जो प्रभु यीशु हमें सिखाते है और ये सभी गुण हमें एक ज़िम्म्मेदार, ईमानदार और आदर्श भारतीय नागरिक बनाते है, जो कि असल में हमारे देश की उन्नति और प्रगती के लिए आवश्यक है ना की उनके जैसी अराजकता जो भारत को रसातल में ले जाने का कार्य कर रही है। गनीमत है कि ये कुछ चंद लोग ही है और सब एक जैसे नही।

याद रखिए कि प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने या बाइबिल पढ़ने से हमारी भारतीयता कम नही हो जाती, देश के लिए उपयोगी और लाभकारी होने की वजह से हम कही ज्यादा भारतीय है। कम से कम उनसे कही ज्यादा जो अराजकता की आग में देश को नर्क बनाने में तुले हुये है।

बस एक अपील है कि भारत देश की एकता और विविधता भरी संस्कृति को बनाए रखने के लिए हम एक साथ मिलजुल कर रहें, यही देश की सच्ची सेवा होगी।

✝जय मसीह की✝
🇮🇳जय भारत🇮🇳

Monday, 24 December 2018

पवित्र आत्मा कौन है?


प्रश्न: पवित्र आत्मा कौन है?

उत्तर: पवित्र आत्मा की पहचान के बारे में कई गलत धारणायें हैं। कुछ लोग पवित्र आत्मा को एक रहस्यात्मक शक्ति के रूप में देखते हैं। अन्य पवित्र आत्मा को व्यक्तित्वहीन अर्थात् व्यक्तित्व शून्य या अव्यक्तिक शक्ति के रूप में देखते हैं जिसे परमेश्वर मसीह के अनुयायियों को उपलब्ध कराता है। पवित्र आत्मा की पहचान के बारे में बाइबल क्या कहती है? साधारण रूप में कहना, बाइबल घोषणा करती है कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है। बाइबल हमें यह भी बताती है कि पवित्र आत्मा एक ईश्वरीय व्यक्ति है, एक ऐसा अस्तित्व जिसमें बुद्धि, भावनाएँ तथा इच्छा है।

सच्चाई तो यह है कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है पवित्रशास्त्र के कई सन्दर्भों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसमें प्रेरितों के काम 5:3-4 भी सम्मिलित है। इस आयत में पतरस हनन्याह का सामना करता है कि उसने पवित्र आत्मा से झूठ क्यों बोला और उसे बताता है कि उसने "मनुष्यों से नहीं परन्तु परमेश्वर से झूठ बोला।" यह एक स्पष्ट घोषणा है कि पवित्र आत्मा से झूठ बोलना परमेश्वर से झूठ बोलना है। हम यह भी जान सकते हैं कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है क्योंकि उसमें परमेश्वर के चारित्रिक गुण है। उदाहरण के लिए, उसकी सर्वव्यापकता भजन संहिता 139:7-8, में देखने को मिलता है, "मैं तेरे आत्मा से भागकर किधर जाऊँ? या तेरे सामने से किधर भागूँ? यदि मैं आकाश पर चढूँ, तो तू वहाँ है! यदि मैं अपना बिछौना अधोलोक में बिछाऊँ तो वहाँ भी तू है!" फिर 1कुरिन्थियों 2:10-11 में हम पवित्र आत्मा के सर्वज्ञानी होने के गुण को देखते हैं। "परन्तु परमेश्वर ने उनको अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन् परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जाँचता है। मनुष्य में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है? वैसा ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा।"

हम यह जान सकते हैं कि पवित्र आत्मा निश्चय ही एक ईश्वरीय व्यक्ति है क्योंकि उसमें बुद्धि, भावनाएँ तथा इच्छा है। पवित्र आत्मा सोचता और जानता है (1कुरिन्थियों 2:10)। पवित्र आत्मा दुखित भी हो सकता है (इफिसियों 4:30)। आत्मा हमारे लिए मध्यस्थता करता है (रोमियों 8:26-27)। पवित्र आत्मा अपनी इच्छानुसार निर्णय लेता है (1कुरिन्थियों 12:7-11)। पवित्र आत्मा परमेश्वर है, त्रिएकत्व का तीसरा "व्यक्ति" है। परमेश्वर होने के नाते, पवित्र आत्मा एक सहायक और सलाहकार के रूप में सही कार्य कर सकता है जैसा कि यीशु ने वचन दिया था कि वह करेगा (यूहन्ना 14:16, 26, 15:26)।

Tuesday, 18 December 2018

दोगले मसीही

ये मेरी पोस्ट उन दोगले मसीहियों के लिये है जो हैप्पी दीपावली तो बोल देते है लेकिन हैप्पी गणेश चतुर्थी और हैप्पी शिवरात्रि बोलने में कतराते है।
अब इन दोगलों को कौन समझाये कि जब आप हैप्पी दीपावली बोलते हो तो और ये इसलिये बोला जाता है कि जब रामचन्द्र जी वनवास से लौटे थे तब लोगों ने उनका दीप जलाकर स्वागत किया था।
तो जब आप हैप्पी दीपावली बोल रहे हो तब आप ये बोल रहे हो कि रामचन्द्र जी का वनवास से आगमन मुबारक हो!
तो रामचन्द जी के वनवास के आगमन पर अगर आप बधाई दे रहे है तो फिर गणेश चतुर्थी पे बधाई देने में आपको प्रॉब्लम क्या है?
फिर हैप्पी शिवरात्रि बोलने में समस्या क्यों है!

मुझे ये समझ में नही आता कि ये दोगले ऐसा करके क्या साबित करना चाहते है!!!!!

क्योंकि हैप्पी दीपावली आप जब बोल रहे हो तो आप इस बात से सहमत होते हो कि रामचन्द्र जी वनवास से लौटे तो उनका लोगों ने दीप जलाकर स्वागत किया। हैप्पी दीपावली बोलते हो तो, लक्ष्मी पूजा जो इस दिन की जाती है, उससे आप सहमत हो। इतना सब कुछ करते हो दोगलों!
तो हैप्पी गणेश चतुर्थी क्यों नही बोलते हो!

तो कुछ सटके हुये ऐसे भी है जो हैप्पी गणेश चतुर्थी बोल देते है, तो मंदिर में जाकर घण्टा बजाकर पूजा करने में क्या तकलीफ है? अगर दूसरों को पूजा की बधाई दे रहे हो। दीपावली में दीपक जलाकर पूजा की जाती है इसलिये इसको दीपावली कहा जाता है। तो दीपक जलाने वाली पूजा से आप सहमत हो, तो क्यों न तुम भी जाकर उस पूजा में शामिल हो जाओ दोगलों!

मुझे प्रॉब्लम तुमसे इसलिये है कि इतना दोगलापन क्यों है तुम्हारी जिंदगी में??
बाकी मैं आपसे प्यार करता हूँ और आपके दोगलेपन से घृणा करता हूँ।
आपके लिये मेरी जान हाजिर है पर आपके दोगलेपन के खिलाफ हूँ। दुश्मन हूं आपके दोगलेपन का।
Love You.
God Bless You.
Every Blessing.
सभी हिन्दुओं को परमेश्वर आशीष दे, सभी ईसाईयों को परमेश्वर आशीष दे।
आमीन✝

Thursday, 13 December 2018

परमेश्वर का प्रेम क्या है

What is love of god

***- परमेश्वर का प्रेम क्या है ? ***

^^ कैसे परमेश्वर का प्रेम हममें से बहेगा ? ^^

कुछ विश्वासी लोग परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं

"परमेश्वर मुझको प्रेम दें"

यदि आप ऐसी प्रार्थना कर रहे हो तो आप अपने समय की बर्बादी कर रहे हो यदि आप नया जन्म (पवित्र आत्मा का दान) पाये हुए हो तो पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर का प्रेम आपके हृदय में पहले से डाला गया है।

रोमियों 5:5 "परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में उण्डेला गया है, डाला गया है।"

1यूहन्ना 3:14 "हम जानते हैं कि हम मृत्यु से जीवन में प्रवेश कर चुके हैं।"

क्योंकि हम ने उसको पा लिया है। तो आप यदि नया जन्म पाये हुए हो तो परमेश्वर का प्रेम आपके अंदर में है।

प्रेम आपका स्वभाव है। आप प्रेमी परमेश्वर के प्रेमी संतान हो।

तो इस प्रेम के स्वभाव से उसको लेकर आपको क्या करना होगा ?

आपको परमेश्वर के वचन में से लेकर खाते रहना होगा आपको लगातार अभ्यास करते रहना होगा इसी प्रकार से प्रेम में आप बढ़ने पाओगे।

इस बात को आप कभी भी न भूलें कि आप प्रेमी परमेश्वर की प्रेमी संतान हो ये बात आप कहें (अंगीकार करें) मैं प्रेम से जन्मा हूँ। परमेश्वर का प्रेम मेरे हृदय में है। मैं उस प्रेम को अनुमति देता हूँ कि मुझ पर प्रभुता करे । आमीन

तो आप प्रेमी परमेश्वर के प्रेमी संतान हैं प्रेम आपका स्वाभाव है। आपके सर को या दिमाग को यह अनुमति न दो कि आपके ऊपर प्रभुता करे। आपकी आत्मा में वास्तव में आप सबसे प्यार करते हो अपनी आत्मा को आपके ऊपर प्रभुता करने की अनुमति दो उस प्रेम को जो आपकी आत्मा के अंदर में है उसको अनुमति दो कि आपके हर एक क्षेत्र के ऊपर प्रभुता करे।

Sunday, 2 December 2018

परमेश्वर द्वारा की गई सृष्टि की रचना

1 आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया। 2 पृथ्वी बेडौल और सुनसान थी। धरती पर कुछ भी नहीं था। समुद्र पर अंधेरा छाया था और परमेश्वर की आत्मा जल के ऊपर मण्डराती थी।

पहला दिन–उजियाला
3 तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो”  और उजियाला हो गया। 4 परमेश्वर ने उजियाले को देखा और वह जान गया कि यह अच्छा है। तब परमेश्वर ने उजियाले को अंधियारे से अलग किया। 5 परमेश्वर ने उजियाले का नाम “दिन” और अंधियारे का नाम “रात” रखा।

शाम हुई और तब सवेरा हुआ। यह पहला दिन था।

दूसरा दिन—आकाश
6 तब परमेश्वर ने कहा, “जल को दो भागों में अलग करने के लिए वायुमण्डल  हो जाए।” 7 इसलिए परमेश्वर ने वायुमण्डल बनाया और जल को अलग किया। कुछ जल वायुमण्डल के ऊपर था और कुछ वायुमण्डल के नीचे। 8 परमेश्वर ने वायुमण्डल को “आकाश” कहा! तब शाम हुई और सवेरा हुआ। यह दूसरा दिन था।

तीसरा दिन—सूखी धरती और पेड़ पौधे
9 और तब परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी का जल एक जगह इकट्ठा हो जिससे सूखी भूमि दिखाई दे” और ऐसा ही हुआ। 10 परमेश्वर ने सूखी भूमि का नाम “पृथ्वी” रखा और जो पानी इकट्ठा हुआ था, उसे “समुद्र” का नाम दिया। परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है।

11 तब परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी, घास, पौधे जो अन्न उत्पन्न करते हैं, और फलों के पेड़ उगाए। फलों के पेड़ ऐसे फल उत्पन्न करें जिनके फलों के अन्दर बीज हों और हर एक पौधा अपनी जाति का बीज बनाए। इन पौधों को पृथ्वी पर उगने दो” और ऐसा ही हुआ। 12 पृथ्वी ने घास और पौधे उपजाए जो अन्न उत्पन्न करते हैं और ऐसे पेड़, पौधे उगाए जिनके फलों के अन्दर बीज होते हैं। हर एक पौधे ने अपने जाति अनुसार बीज उत्पन्न किए और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है।

13 तब शाम हुई और सवेरा हुआ। यह तीसरा दिन था।

चौथा दिन—सूरज, चाँद और तारे
14 तब परमेश्वर ने कहा, “आकाश में ज्योति होने दो। यह ज्योति दिन को रात से अलग करेंगी। यह ज्योति एक विशेष चिन्ह के रूप में प्रयोग की जाएंगी जो यह बताएंगी कि विशेष सभाएं कब शुरू की जाएं और यह दिनों तथा वर्षों के समय को निश्चित करेंगी। 15 पृथ्वी पर प्रकाश देने के लिए आकाश में ज्योति ठहरें” और ऐसा ही हुआ।

16 तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाईं। परमेश्वर ने उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर राज करने के लिए बनाया और छोटी को रात पर राज करने के लिए बनाया। परमेश्वर ने तारे भी बनाए। 17 परमेश्वर ने इन ज्योतियों को आकाश में इसलिए रखा कि वेह पृथ्वी पर चमकें। 18 परमेश्वर ने इन ज्योतियों को आकाश में इसलिए रखा कि वह दिन तथा रात पर राज करें। इन ज्योतियों ने उजियाले को अंधकार से अलग किया और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है।

19 तब शाम हुई और सवेरा हुआ। यह चौथा दिन था।

पाँचवाँ दिन—मछलियाँ और पक्षी
20 तब परमेश्वर ने कहा, “जल, अनेक जलचरों से भर जाए और पक्षी पृथ्वी के ऊपर वायुमण्डल में उड़ें।” 21 इसलिए परमेश्वर ने समुद्र में बहुत बड़े—बड़े जलजन्तु बनाए। परमेश्वर ने समुद्र में विचरण करने वाले प्राणियों को बनाया। समुद्र में भिन्न—भिन्न जाति के जलजन्तु हैं। परमेश्वर ने इन सब की सृष्टि की। परमेश्वर ने हर तरह के पक्षी भी बनाए जो आकाश में उड़ते हैं। परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है।

22 परमेश्वर ने इन जानवरों को आशीष दी, और कहा, “जाओ और बहुत से बच्चे उत्पन्न करो और समुद्र के जल को भर दो। पक्षी भी बहुत बढ़ जाएं।”

23 तब शाम हुई और सवेरा हुआ। यह पाँचवाँ दिन था।

छठवाँ दिन—भूमि के जीवजन्तु और मनुष्य
24 तब परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी हर एक जाति के जीवजन्तु उत्पन्न करे। बहुत से भिन्न जाति के जानवर हों। हर जाति के बड़े जानवर और छोटे रेंगनेवाले जानवर हों और यह जानवर अपनी जाति के अनुसार और जानवर बनाएं” और यही सब हुआ।

25 तो, परमेश्वर ने हर जाति के जानवरों को बनाया। परमेश्वर ने जंगली जानवर, पालतू जानवर, और सभी छोटे रेंगनेवाले जीव बनाए और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है।

26 तब परमेश्वर ने कहा, “अब हम मनुष्य बनाएं। हम मनुष्य को अपने स्वरूप जैसा बनाएगे। मनुष्य हमारी तरह होगा। वह समुद्र की सारी मछलियों पर और आकाश के पक्षियों पर राज करेगा। वह पृथ्वी के सभी बड़े जानवरों और छोटे रेंगनेवाले जीवों पर राज करेगा।”

27 इसलिए परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में  बनाया। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरुप में सृजा। परमेश्वर ने उन्हें नर और नारी बनाया। 28 परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी। परमेश्वर ने उनसे कहा, “तुम्हारी बहुत सी संताने हों। पृथ्वी को भर दो और उस पर राज करो। समुद्र की मछलियों और आकाश के पक्षियों पर राज करो। हर एक पृथ्वी के जीवजन्तु पर राज करो।”

29 परमेश्वर ने कहा, “देखो, मैंने तुम लोगों को सभी बीज वाले पेड़ पौधे और सारे फलदार पेड़ दिए हैं। ये अन्न तथा फल तुम्हारा भोजन होगा। 30 मैं प्रत्येक हरे पेड़ पौधो जानवरों के लिए दे रहा हूँ। ये हरे पेड़—पौधे उनका भोजन होगा। पृथ्वी का हर एक जानवर, आकाश का हर एक पक्षी और पृथ्वी पर रेंगने वाले सभी जीवजन्तु इस भोजन को खाएंगे।” ये सभी बातें हुईं।

31 परमेश्वर ने अपने द्वारा बनाई हर चीज़ को देखा और परमेश्वर ने देखा कि हर चीज़ बहुत अच्छी है।

शाम हुई और तब सवेरा हुआ। यह छठवाँ दिन था।

सातवाँ दिन—विश्राम
2 इस तरह पृथ्वी, आकाश और उसकी प्रत्येक वस्तु की रचना पूरी हुई। 2 परमेश्वर ने अपने किए जा रहे काम को पूरा कर लिया। अतः सातवें दिन परमेश्वर ने अपने काम से विश्राम किया। 3 परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीषित किया और उसे पवित्र दिन बना दिया। परमेश्वर ने उस दिन को पवित्र दिन इसलिए बनाया कि संसार को बनाते समय जो काम वह कर रहा था उन सभी कार्यों से उसने उस दिन विश्राम किया।

स्वामी विवेकानन्द

हिन्दू धर्म के प्रतिष्ठित धार्मिक अगुवे स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा #प्रभु_यीशु_मसीह के बारे में कहे गये चन्द कथन.....। धन्य है वे जातियाँ...